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ताप विद्युत केंद्र क्या होता है? (What is Thermal Power Plant )

नमस्कार दोस्तों इस लेख में हम जानेंगे कि ताप विद्युत केंद्र (Thermal Power plant) क्या होता है तथा किन-किन बातों को ध्यान में रख कर इसे बनाया जाता है। तथा इसके विभिन्न घटकों को जानेंगे। इससे जुड़े हुए अनेक तथ्यों के बारे में जानेंगे।

ताप विद्युत केंद्र (Thermal Power plant)

भारतवर्ष में उत्पादित विद्युत शक्ति का अधिक भाग ताप शक्ति संयन्त्रों द्वारा जनित किया जाता है। ताप शक्ति संयन्त्रों में ठोस, द्रव अथवा गैस किसी भी प्रकार का ईंधन प्रयुक्त किया जा सकता है।
ताप जनित केन्द्रों में कोयले को जलाकर इसकी ऊष्मा से बायलर में उच्च दाब तथा ताप पर वाष्प उत्पन्न की जाती है। इस वाष्प से स्टीम टरबाइन अथवा स्टीम इंजिन चलाते जाते हैं जिनसे युग्मित (Coupled) जेनरेटर विद्युत शक्ति उत्पन्न करते है।

ताप विद्युत गृहों के लिए स्किल चयन करते समय निम्न बातों का ध्यान रखा जाता है –

  1. विद्युत भार भार के निकट (Nearest to load)
  2. जल सप्लाई की पर्याप्त उपलब्धता (Sufficient availability of water)
  3. ईंधन की प्रचुर मात्रा में उपलब्धता (Plenty of fuel)
  4. परिवहन सुविधा (Transportation facility)
  5. आबादी क्षेत्रों से दूर
  6. राख समस्या (Ash disposal)

ताप विद्युत केन्द्र के मुख्य घटक (Main components of thermal power plant)

बायलर (Boiler)

ताप विद्युत केन्द्रों में फायर ट्यूब तथा वाटर ट्यूब दोनों प्रकार के बायलर प्रयोग किये जाते हैं। फायर ट्यूब बायलर की ट्यूब में गर्म गैस होती है जिन्हें पानी घेरे रहता है। जबकि वाटर ट्यूब बायलर की ट्यूब में पानी भरा रहता है तथा गर्म गैसें बाहरी ओर से पानी को गर्म करती है।

बायलर भट्टी (Boiler Furnance)

यह बायलर का वह भाग है जहां ईंधन जलकर ऊष्मा में परिवर्तित होता है।

कोयला जलाने की दो विधियां है –

  1. हेण्ड फायरिंग
  2. मैकेनिक फायरिंग

मैकेनिकल विधि से कोयला जलाने हेतु स्टोकर्स का प्रयोग किया जाता है। स्टोकर्स गुरुत्व शक्ति (Gravitational Power) द्वारा कोयला ग्रहण कर दहन भट्टी तक ले जाते हैं तथा कोयला जलने के पश्चात राख को उचित स्थान पर पहुंचाते हैं।

Thermal Power plant
Thermal Power plant

पाउडर ईंधन प्रयोग के लाभ

  1. इससे बायलर अधिक समय तक उच्च क्षमता से प्रचालित किया जा सकता है।
  2. वाष्प की तीव्रता बढ़ाई जा सकती है।
  3. दहन हेतु वायु की कम आवश्यकता होती है।
  4. दहन क्रिया अधिक देर चलती है।
  5. निम्न ग्रेट का कोयला भी प्रयुक्त किया जा सकता है।
  6. इंधन व वायु को समायोजित कर दक्षता बढ़ायघ जा सकती है।
  7. राख हटाने की समस्या कम हो जाती है।

सुपरहीटर तथा रि-हीटर (Super heater and Reheater)

वाष्प के उचित तापक्रम (950°F) को सहन करने हेतु कार्बन स्टील की ट्यूब एवं 1200°F स्टीम तापक्रम हेतु स्टेन स्टील की ट्यूब जिनका व्यास 25mm से 64mm होता है, सुपर हीटर में लगाई जाती है।

सुपर हीटर दो प्रकार के होते हैं –

  1. रेडियल सुपर हीटर
  2. कनवैक्शनल सुपर हीटर

रेडियल सुपर हीटर भट्टी में, भट्टी की पानी की दीवार में लगे होते हैं। ईंधन जलने से विकिरण द्वारा ऊष्मा अवशोषित करते हैं। सुपरहीटर का तापक्रम वाष्प निर्गत बढ़ते ही कम हो जाता है। कनवैक्शन सुपरहीटर ट्यूब के पीछे लगा होता है और दग्ध गैसों से संवहन द्वारा ऊष्मा प्राप्त करते हैं। इनका तापक्रम स्टीम निर्यात वृद्धि के साथ बढ़ता है। कनवैक्शन सुपर हीटर की साधारणतया प्रयोग किये जाते हैं।

वाष्प को अति उच्च तापक्रम तक सुपरहीट करने का उद्देश्य दक्षता बढ़ाना है इसके निम्न लाभ हैं –

  1. निश्चित आउटपुट ऊर्जा हेतु आवश्यक वाष्प की मात्रा में कमी हो जाती है। वाष्प की आन्तरिक ऊर्जा होने से टरबाइन का आकार छोटा हो जाता है।
  2. अति ऊष्मित वाष्प शुष्क होने के कारण टरवाइन के ब्लेड शुष्क रहते हैं जिससे इन पर से प्रवाहित वाष्प के प्रवाह में यांत्रिक प्रतिरोध कम हो जाता है, परिणामस्वरुप दक्षता बढ़ जाती है।
  3. टरबाइन ब्लेड पर शुष्क वाष्प प्रवाहित होने से इसमें गड्ढे नहीं पढ़ते और न ही जंग लगता है।

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